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बलूचिस्तानः जो लापता हो चुके हैं उन अपनों को ढूंढतीं औरतें

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image BBC सायरा बलोच अपने लापता हुए भाई को ढूंढ रही हैं, जो साल 2018 से लापता हैं.

सायरा बलोच जब 15 साल की थीं, तब उन्होंने पहली बार मुर्दाघर में क़दम रखा था.

वहां मंद रोशनी वाले कमरे में उन्होंने कुछ सिसकियां, कुछ फुसफुसाती प्रार्थनाएं और कुछ लोगों के पैरों की सरसराहट सुनी थी.

सायरा ने उस समय जो पहली लाश देखी थी, वो एक आदमी की थी. उस लाश को देखकर लग रहा था कि उस आदमी को बहुत प्रताड़ित किया गया था.

उसकी आंखें ग़ायब थीं. उसके दांत निकाल लिए गए थे. उसके सीने पर जलाए जाने के निशान थे.

सायरा उन पलों को याद करते हुए बताती हैं, "मैं दूसरी लाशों को नहीं देख पा रही थी. मैं बाहर चली गई."

मगर, अब वह चिंता मुक्त थीं, क्योंकि यह शव उनके भाई का नहीं था, जो एक पुलिस अधिकारी था.

उनके भाई को पाकिस्तान के एक सबसे अशांत इलाक़े से साल 2018 में आतंकवाद के ख़िलाफ़ चलाए गए अभियान के दौरान गिरफ़्तार किया गया था.

इस बीच, मुर्दाघर में बाकी लोग भी अपनों की तलाश में जुटे थे. वहां लावारिस लाशों की क़तार को जांच रहे थे.

सायरा ने भी अब इस डरावनी दिनचर्या को अपना लिया है. वो एक के बाद एक मुर्दाघर में जाती हैं. किसी अपने को तलाशती हैं.

वहां कमरे में ट्यूब लाइट की मंद रोशनी है. हवा में सड़न और एंटीसेप्टिक की गंध फैली है.

सरकार क्या कहती है? image BBC विरोध प्रदर्शन में लापता लोगों की तस्वीर कुछ इस तरह से प्रदर्शित की जाती है.

सायरा जब कभी भी मुर्दाघर जाती, तो यही उम्मीद करती कि जो वो ढूंढ रही हैं, वो उनको ना मिले.

बीते सात सालों से यही हो रहा है, और अब तक उनको वो नहीं मिला है, जिसकी उनको तलाश है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले दो दशकों में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने हज़ारों बलोच मूल के लोगों को ग़ायब कर दिया है.

कथित तौर पर इन लोगों को बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया था.

या फिर बलूचिस्तान प्रांत में दशकों पुराने अलगाववादी विद्रोह के ख़िलाफ़ जारी सुरक्षा बलों के अभियान में इन लोगों का अपहरण किया गया, इनको प्रताड़ित किया गया और फिर इनको मार दिया गया.

पाकिस्तान सरकार इन आरोपों से इनकार करती है. सरकार इस बात पर ज़ोर देती है कि लापता लोगों में से कई अलगाववादी समूहों से जुड़ चुके हैं या देश छोड़कर जा चुके हैं.

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कैसा है बलूचिस्तान? image Getty Images बलूचिस्तान में प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं.

उनमें से कुछ सालों बाद लौटते हैं. कुछ गहरे सदमे में हैं और टूट चुके हैं. मगर, ज़्यादातर कभी नहीं लौटे.

बाकियों की लाश उन अप्रत्यक्ष कब्रों में मिली, जो पूरे प्रांत में यहां-वहां दिखती हैं. उनकी लाश इतनी ख़राब स्थिति में है, जिनको पहचाना भी नहीं जा सकता है.

और इन सबके बीच वो महिलाएं हैं, जिनकी ज़िंदगी को इंतज़ार के रूप में परिभाषित किया जाता है.

इनमें युवा और बुज़ुर्ग हैं, जो प्रदर्शनों में शामिल होती हैं. उनके चेहरों पर दुख की रेखाएं हैं. उनके हाथों में उन आदमियों की धुंधली हो चुकी तस्वीरें हैं, जो अब उनके जीवन का हिस्सा नहीं हैं.

जब बीबीसी ने उन महिलाओं से उनके घरों में मुलाक़ात की, तो उन्होंने हमें काली चाय ऑफ़र की. सुलेमानी चाय, जो टूटे हुए कपों में दी गई. उन महिलाओं की आवाज़ में दर्द है.

कई महिलाएं इस बात पर ज़ोर देते हुए कहती हैं कि उनके पिता, भाई और बेटे बेगुनाह हैं.

उनको केवल इसलिए निशाना बनाया गया, क्योंकि वो राज्य की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ बोलते थे. उन सभी को सामूहिक सज़ा के तौर पर ले जाया गया.

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महिलाओं ने क्या बताया? image BBC जिन महिलाओं को अपने परिजनों की तलाश है, वो विरोध प्रदर्शन में शामिल होती हैं.

सायरा भी इन्हीं महिलाओं में से एक हैं.

वह बताती हैं कि पहले उन्होंने उनके लापता भाई के बारे में पुलिस से पूछा, कई राजनेताओं से अपील की, लेकिन जब कहीं से कोई जवाब नहीं मिला, तो उन्होंने भी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेना शुरू कर दिया.

मुहम्मद आसिफ़ बलोच को अगस्त 2018 में 10 अन्य लोगों के साथ नुश्की में गिरफ़्तार किया गया था. यह अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगी सीमा के पास स्थित एक शहर है.

उनके परिवार ने उनको अगले दिन टीवी पर देखा था, तब वह बहुत डरा हुआ दिख रहा था.

अधिकारियों ने कहा कि ये सभी आदमी "आतंकवादी थे, जो अफ़ग़ानिस्तान भाग रहे थे." मुहम्मद के परिवार ने कहा कि वह अपने दोस्तों के साथ पिकनिक पर गए थे.

हिरासत में लिए गए लोगों में से तीन को साल 2021 में रिहा कर दिया गया था, मगर उन्होंने यह नहीं बताया कि हुआ क्या था.

मुहम्मद कभी भी घर नहीं लौटा.

यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जिसमें देश का 44 फ़ीसदी हिस्सा आता है. यह ज़मीन गैस, कोयला, सोना और तांबे से भरपूर है. यह इलाक़ा अरब सागर तक फैला है.

मगर, बलूचिस्तान अभी भी समय की मार झेल रहा है. सुरक्षा कारणों से इसके कई इलाक़ों में जाने की अनुमति नहीं है. विदेशी पत्रकारों को यहां प्रवेश करने से अक्सर मना कर दिया जाता रहा है.

यहां घूमना-फिरना भी कठिन है.

सड़कें लंबी और सुनसान हैं, जो बंजर पहाड़ियों और रेगिस्तान से होकर गुज़रती हैं. जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं, बुनियादी ढांचा कम होता जाता है. सड़कों की जगह धूल भरा रास्ता दिखता है, जहां कुछ देर पहले गुज़रे वाहनों के टायरों के निशान दिखते हैं.

बिजली थोड़ी-बहुत है, पानी दुर्लभ है. स्कूल और अस्पताल बुरी हालत में हैं.

बाज़ार में, मिट्टी की दुकानों के बाहर बैठे आदमियों को उन ग्राहकों का इंतज़ार है, जो कभी-कभार ही आते हैं. लड़के अपना करियर पाकिस्तान में देखते हैं. वो यहां से (बलूचिस्तान) निकल जाने की बात कहते हैं.

कोई कराची जाने की बात करता है तो कोई खाड़ी देश, या कोई अन्य जगह जहां इस धीमी घुटन से उनको निजात मिल सके.

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कब बना बलूचिस्तान? image BBC डॉक्टर महरांग बलोच, बलोच नेता की बेटी हैं.

बलूचिस्तान साल 1948 में पाकिस्तान का हिस्सा बना था. यह वो समय था, जब ब्रिटिश इंडिया का विभाजन हुआ था, उस दौर में माहौल में उथल-पुथल मची हुई थी.

तब कुछ प्रभावशाली जनजातीय नेताओं ने बलूचिस्तान की आज़ादी की मांग की थी और इस बात का विरोध किया था.

कुछ प्रतिरोधी उग्रवादी बन गए. उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस इलाक़े का सिर्फ़ दोहन किया है, और इसके विकास के लिए कुछ नहीं किया.

उग्रवादी समूह जैसे बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) को पाकिस्तान और अन्य राष्ट्रों द्वारा आतंकी संगठन घोषित किया गया है.

बीएलए की ओर से अब सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ हमले और बमबारी की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है.

इस महीने की शुरुआत में, बीएलए ने बोलन दर्रे में एक ट्रेन को हाईजैक कर लिया था.

इसमें सैकड़ों यात्री सवार थे. बीएलए ने इन यात्रियों की रिहाई के बदले बलूचिस्तान से लापता हुए लोगों को रिहाई करने की मांग रखी थी.

यह घेराबंदी 30 घंटे तक चली थी.

अधिकारियों के मुताबिक, 33 बीएलए उग्रवादी, 21 नागरिक और चार सैन्य कर्मी इसमें मारे गए. मगर, विवादित आंकड़े बताते हैं कि कई यात्री लापता हैं.

इस प्रांत से बड़ी संख्या में लोगों का लापता होना व्यापक तौर पर पाकिस्तान की रणनीति का हिस्सा माना जाता है.

इसके तहत बग़ावत की आवाज़, असहमति को दबाना, राष्ट्रवादी भावनाओं और आज़ाद बलूचिस्तान के समर्थन की मांग को कमज़ोर करने की कोशिश की जाती है.

लापता होने वाले लोगों में से कई बलोच राष्ट्रवादी समूहों के संदिग्ध सदस्य हैं या उनसे सहानुभूति रखते हैं या आज़ादी और ज़्यादा स्वायत्तता की मांग करते हैं.

मगर, अहम आंकड़ा उन सामान्य लोगों का है, जिनका किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं है.

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बलूचिस्तान के सीएम ने क्या बताया?

बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफ़राज़ बुगती ने बीबीसी से कहा कि लोगों का गायब हो जाना एक मुद्दा है, मगर उन्होंने इस बात को ख़ारिज कर दिया कि यह बड़ी तादाद में हो रहा है.

उन्होंने इसे 'सुनियोजित दुष्प्रचार' बताया.

वह कहते हैं, "बलूचिस्तान में हर बच्चे को 'लापता आदमी, लापता आदमी' सुनाया गया है. मगर, यह कौन तय करेगा कि किसने किसको गायब किया है?"

"लोग खुद भी लापता हो जाते हैं. मैं यह बात कैसे साबित कर सकता हूं कि किसी व्यक्ति को ख़ुफ़िया एजेंसी, पुलिस या कोई और, या मैं या आप कहीं लेकर चले गए."

पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता लेफ़्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ़ ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था, "राज्य लापता हुए लोगों का मामला व्यवस्थित तरह से सुलझा रहा है."

इस दौरान, उन्होंने उन आधिकारिक आंकड़ों को दोहराया, जिसे सरकार द्वारा आमतौर पर बताया जाता रहा है. इसके तहत, बलूचिस्तान में साल 2011 से लापता हुए लोगों के 2900 से ज़्यादा मामले रिपोर्ट किए गए, जिनमें से 80 फ़ीसदी से ज़्यादा मामले सुलझाए जा चुके हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि यह संख्या और भी ज़्यादा है, क़रीब 7 हज़ार के आसपास. मगर, डाटा का कोई एक विश्वसनीय स्रोत या तरीका नहीं है, जिसके तहत किसी के दावों को जांचा जा सके.

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'चुप रहना कोई विकल्प नहीं' image BBC जन्नत बीबी विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए पैसे तक उधार ले लेती हैं.

जन्नत बीबी जैसी महिलाएं आधिकारिक आंकड़ों को नकारती हैं.

वह अभी भी अपने बेटे नज़र मुहम्मद को ढूंढ रही हैं. वह दावा करती हैं कि साल 2012 में उनके बेटे का अपहरण कर लिया गया था, जब वह एक होटल में नाश्ता कर रहा था.

वह कहती हैं, "मैं उसको ढूंढने के लिए हर जगह गई. मैं इस्लामाबाद भी गई. मुझे केवल अस्वीकृति ही मिली."

यह 70 वर्षीय जन्नत राजधानी क्वेटा के बाहरी इलाक़े में एक छोटे से मिट्टी के मकान में रहती हैं. यह इलाक़ा उस सांकेतिक कब्रिस्तान से ज़्यादा दूर नहीं है, जो लापता होने वालों लोगों की कब्र मानी जाती है.

जन्नत एक छोटी सी दुकान चलाती हैं. वह दूध और बिस्किट्स बेचती हैं.

वह लापता होने वालों की जानकारी मांगने के लिए किए जा रहे प्रदर्शनों में हिस्सा लेने जाने के लिए बस का किराया नहीं दे पाती हैं. मगर, इसके लिए वो पैसे उधार लेती हैं, जितने ले सकती हैं.

वह कहती हैं, "चुप रहना कोई विकल्प नहीं है."

इनमें से ज़्यादातर लोग साल 2006 के बाद लापता हो गए. इनमें उन लोगों के परिवार भी शामिल हैं, जिनसे हमने बातचीत की है.

यह वो साल था, जब प्रमुख बलोच नेता नवाब अकबर बुगती को एक सैन्य अभियान में मार गिराया गया था. इसके बाद सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन और सशस्त्र विद्रोही गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई.

इसके बाद, सरकार ने जवाबी कार्रवाई की. लोगों के जबरन गायब होने की घटनाएं बढ़ गईं. सड़कों पर मिलने वाले शवों की संख्या भी बढ़ गई.

साल 2014 में टुटक में सामूहिक कब्रें मिलीं, जो लापता हुए लोगों की थीं. टुटक, क्वेटा से 275 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित ख़ुज़दार शहर के पास एक छोटा शहर है, जहां सायरा रहती हैं.

इन लाशों की हालत इतनी ख़राब हो चुकी थी कि इनको पहचानना मुश्किल था. टुटक में जो कुछ मिला, उसने देश को हिला कर रख दिया था. मगर, बलूचिस्तान में रहने वाले लोगों के लिए यह डर कोई नई बात नहीं है.

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अब सड़क पर उतरी नई पीढ़ी image BBC डॉक्टर महरांग बलोच अब बलूचिस्तान में विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करती हैं.

महरांग बलोच के पिता एक मशहूर राष्ट्रवादी नेता थे, जिन्होंने बलूचिस्तान में हिंसा के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया. वो साल 2009 की शुरुआत में गायब हो गए थे.

तीन साल बाद महरांग को एक फ़ोन कॉल आया, जिसमें बताया गया कि प्रांत के दक्षिण में स्थित लासबेला ज़िले में उनका (महरांग के पिता) शव मिला है.

उन्होंने बताया, "जब मेरे पिता का शव पहुंचा, तो उन्होंने वही कपड़े पहन रखे थे, जो अब फट चुके थे. उनको बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था."

उन्होंने पाकिस्तानी सरकार के लिए काम किया, मगर बाद में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी, ताकि बलूचिस्तान को सुरक्षित बनाने के लिए वकालत कर सकें.

महरांग कहती हैं, "उनकी मौत के बाद, हमारी दुनिया ढह गई थी."

उनके भाई को सुरक्षा बलों द्वारा साल 2017 में उठा लिया गया था और क़रीब तीन महीनों तक हिरासत में रखा गया.

यह वो समय था, जब महरांग ने तय किया कि वो लोगों के गायब होने और ग़ैर-क़ानूनी तौर पर उनकी हत्या करने के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ेंगी.

आज, वो इस प्रदर्शन का नेतृत्व करती हैं, जबकि उनको जान से मारने की धमकियां भी दी जाती हैं. उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी मामले दर्ज किए जाते हैं. उनके यात्रा करने पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं.

वह कहती हैं, "हम हमारी धरती पर बिना किसी अत्याचार के जीने का अधिकार चाहते हैं. हम हमारे संसाधन, हमारे अधिकार चाहते हैं. हम इस हिंसा और भय वाले शासन का अंत चाहते हैं."

महरांग यह चेतावनी देती हैं कि लोगों को जबरन गायब किया जाना इस विरोध को बढ़ाएगा, ना कि खामोश करेगा.

वह कहती हैं, "वे सोचते हैं कि लाशों को दफ़ना देने से यह ख़त्म हो जाएगा. मगर, कोई अपनों को इस तरह खो देने के बाद कैसे भूल सकता है? कोई इंसान इसे नहीं सहेगा."

वह संस्थानों के सुधार की मांग करती हैं. वह यह मांग करती हैं कि यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी मां को अपने बेटे को डर के कारण खुद से दूर ना भेजना पड़े.

वह कहती हैं, "हम नहीं चाहते हैं कि हमारे बच्चे विरोध शिविरों में बड़े हों. क्या हम यह बहुत ज़्यादा मांग रहे हैं?"

अब जबकि वह उस भविष्य के लिए लड़ रही हैं, जो वह चाहती हैं. इस बीच, एक नई पीढ़ी पहले से सड़कों पर है.

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बच्चे भी कर रहे विरोध image BBC मासूमा भी स्कूल से ज़्यादा समय विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने में बिताती हैं.

दस साल की मासूमा अपने स्कूल बैक को कस कर पकड़ लेती हैं, क्योंकि वो प्रदर्शनकारियों की भीड़ के पास से गुज़र रही हैं. उनकी आंखें हर किसी को स्कैन कर रही हैं. वो ढूंढ रही हैं एक चेहरा, जो उनके पिता जैसा दिखता हो.

वह कहती हैं, "एक बार मैंने एक आदमी को देखा था, और सोचा कि वो मेरे पिता थे. मैं दौड़कर उनके पास गई और उसके बाद मुझे अहसास हुआ कि वो कोई और थे."

"हर किसी के पिता काम के बाद घर पर लौट आते हैं. मुझे मेरे पिता कभी नहीं मिले."

मासूमा जब केवल तीन महीने की थीं, जब सुरक्षा बलों द्वारा कथित तौर पर क्वेटा में देर रात की गई छापामारी में उनके पिता को उठाकर ले जाया गया था. मासूमा की मां को कहा गया था कि मासूमा के पिता को कुछ घंटों बाद छोड़ दिया जाएगा. लेकिन, वो कभी नहीं लौटे.

आज मासूमा क्लास रूम से ज़्यादा समय प्रदर्शन में बिताती हैं. उनके पिता की तस्वीर हमेशा उनके साथ रहती है. वो उस तस्वीर को अपने स्कूल बैग में सुरक्षित रखती हैं.

image BBC मासूमा के पिता की तस्वीर, जो वो अपने स्कूल बैग में हमेशा रखती हैं.

हर पाठ शुरू होने से पहले वो इस तस्वीर को बाहर निकालती हैं और निहारती हैं.

"मैं हमेशा उत्सुक रहती हूं कि क्या मेरे पिता आज घर आएंगे."

वह विरोध शिविरों के बाहर खड़ी रहती हैं, और दूसरों के साथ मिलकर नारे लगाती हैं. दुखी परिवारों की भीड़ में छोटी सी मासूमा खो गई हैं.

जैसे ही प्रदर्शन समाप्त होने को होता है, तो वो कोने में एक पतली सी चटाई पर पैर मोड़कर बैठ जाती हैं. नारों की आवाज़ और यातायात का शोर धीमा पड़ जाता है, जब वह अपने मुड़े हुए कुछ ख़त निकालती हैं, जिन्हें लिखा तो मासूमा ने, मगर कभी भेज नहीं पाईं.

फिर अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में वो उन ख़तों को पढ़ना शुरू कर देती हैं.

"प्यारे बाबा जान, आप वापस कब आएंगे? जब भी मैं कुछ खाती हूं या पानी पीती हूं तो आपको याद करती हूं. बाबा, आप कहां हैं? मैं आपको ख़ूब याद करती हूं. मैं अकेली हूं. आपके बिना, मैं सो नहीं सकती. मैं सिर्फ़ आपसे मिलना चाहती हूं और आपका चेहरा देखना चाहती हूं."

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